देवताओं के गुरु की पवित्र धरां, महर्षि भृगु की बलियाः जिसने ब्रह्मा और भगवान शिव को दिया श्राप

विजय बक्सरी

बलियाः ऋषियों, महर्षियों व तपस्वियों की पवित्र धरती बलिया, जहां की धरती का कोना-कोना भृगु बाबा के जयघोष से गुंजायमान होता है। बलिया पर जिनकी अपार कृपा बरसती है और बलियावसियों का मस्तक भृगु बाबा की जय के जयघोष संग गर्व से ऊंचा हो जाता है। वहीं महर्षि भृगु जिन्होंने जगतरचयिता भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव को शाप दे दिया और जगत पालनहार भगवान विष्णु के छाती में लात दे मारी। जो ऋषियों के महर्षि रहे और जगत गुरु के रुप में त्रिदेव की परीक्षा ली। ऐसे सिद्ध गुरु महर्षि भृगु को गुरु पुर्णिमा पर पूरा देश श्रद्धा से पूजता है।
पद्मपुराण के अनुसार एक यज्ञ के दौरान ऋषि-मुनियों में इस बात पर विवाद छिड़ गया कि त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) में श्रेष्ठ भगवान कौन है? देवताओं की परीक्षा लेने एवं श्रेष्ठ देवता के चयन के लिए ऋषि-मुनियों ने महर्षि भृगु को परीक्षक नियुक्त किया। जिसके बाद त्रिदेव की परीक्षा लेने के लिए महर्षि भृगु निकल गए त्रिलोक। इसक्रम में महर्षि भृगु सबसे पहले भगवान शंकर के कैलाश पर्वत पहुुचे। जहां भगवान शंकर अपनी पत्नी माता सती के साथ विहार कर रहे थे। महर्षि भृगु को पहुंचते ही नन्दी व अन्य रूद्रगणों ने कैलाश के प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया। भगवान शंकर से मिलने की जिद पर रूद्रगणों ने महर्षि भृगु को अपमानित भी किया। जिससे क्रोधित महर्षि भृगु ने भगवान शंकर को तमोगुणी घोषित करते हुए लिंग रूप में पूजित होने का शाप दे दिया। जिसके कारण ही भगवान शंकर की शिवलिंग की भी पूजा होती है। जिसके बाद महर्षि भृगु ब्रह्मलोक ब्रह्माजी के पास पहुंचे। जहां ब्रह्माजी अपने दरबार में विराज रहे थे। सभी देवतागण उनके समक्ष बैठे हुए थे। ब्रह्माजी ने महर्षि भृगु को बैठने तक को नहीं कहा। जिससे नाराज महर्षि भृगु ने ब्रह्माजी को रजोगुणी घोषित करते हुए अपूज्य होने का शाप दिया। ऐसी मान्यता है कि इस शाप के कारण ही ब्रह्माजी की पूजा नहीं की जाती। कैलाश और ब्रह्मलोक में मिले अपमान से क्रोधित महर्षि भृगु सीधे विष्णुलोक पहुंचे। जहां भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग पर सोए थे और उनकी पत्नी श्रीहरि विष्णु का पैर दबा रही थी। पहले से कुपित महर्षि भृगुजी को प्रतित हुआ कि उन्हें आता देख भगवान विष्णु निद्रा में होने का नाटक कर रहे हैं। जिसके कारण क्रोध में महर्षि भृगु ने दाहिने पैर से विष्णु भगवान की छाती पर जोरदार प्रहार कर दिया। महर्षि के इस अशिष्ट आचरण पर माता क्रोधित हो गई। किंतु निद्रा से जगे भगवान विष्णु ने महर्षि का पैर पकड़ लिया और कहा भगवन! मेरे कठोर वक्ष से आपके कोमल चरण में चोट तो नहीं लगी। भगवान के उक्त उदगार सुन महर्षि भृगु लज्जित भी हुए और प्रसन्न भी। जिसके बाद महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ सतोगुणी घोषित कर दिया। महर्षि भृगु स्वयं ब्रह्माजी के मानस पुत्र माने जाते है।

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