बदला व्यवहार तो एईएस पर भी हुआ वार

एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस)-पिछले वर्ष के सापेक्ष इस बार एईस के मामलों में काफी कमी आई है . पिछले साल 31 अगस्त तक 113 केस रिपोर्ट हुए , इस साल इसी अवधि में मात्र 80 केस रिपोर्ट हुए .

गोरखपुर । कोरोना के कारण लोगों में हुए व्यवहार परिवर्तन का असर एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) पर भी पड़ा है। इस साल 31 अगस्त तक इसके मामले पिछले साल की तुलना में कम रिपोर्ट हुए हैं। मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. श्रीकांत तिवारी ने बताया कि पिछले साल इसी समयावधि तक कुल 113 केस एईएस के सामने आए थे, जबकि इस वर्ष 80 केस रिपोर्ट हुए हैं। उनका मानना है कि कोविड-19 के कारण हाथों की साफ-सफाई और नियमित सैनिटाइजेशन से भी यह बदलाव परिलक्षित हुआ है।

मुख्य चिकित्साधिकारी ने बताया कि पिछले वर्ष 31 अगस्त तक एईएस के कारण छह लोगों की मौत हो गयी थी। इस बार अभी तक यह संख्या एक है। जनपद के 63 केस इलाज के लिए गत वर्ष बीआरडी मेडिकल कालेज रेफर हुए थे, जिनकी संख्या घट कर 43 हो गयी है। उन्होंने बताया कि इस बार मच्छरजनित जापानीज इंसेफेलाइटिस (जेई) के मामलों में भी कमी आई है। इस साल जेई के कुल छह केस रिपोर्ट हुए हैं जिनमें से एक की मौत हुई है। पिछले साल जेई के 32 केस रिपोर्ट हुए थे जिनमें से पांच की मौत हुई थी।

उन्होंने बताया कि कोविड-19 के कारण जगह-जगह सैनिटाइजेशन के भी अभियान चले जिसके कारण मच्छरों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम हुआ है। लोगों ने कोविड से बचने के लिए हाथों के सैनेटाइजेशन और साबुन पानी से साफ-सफाई बार-बार हाथ धुलने और साफ-सफाई पर जोर दिया है। एईएस के मामलों में मच्छर, चूहा, छछूंदर, हाथों की गंदगी, दूषित पानी का सेवन प्रमुख कारक हैं लेकिन लोगों के व्यवहार में आए बदलाव से इन कारकों का भी उन्मूलन हो रहा है। उन्होंने जनपद के लोगों से अपील की है कि कोरोना के प्रति बरते जाने वाले सतर्कता के व्यवहार से अन्य बीमारियों को नियंत्रित करने में इसी प्रकार का सामुदायिक योगदान दें। साथ ही उन्होंने स्वयंसेवी संगठन पाथ की इंसेफेलाइटिस के रोकथाम में तकनीकी तौर पर मदद देने के लिए सराहना भी की है।

अस्पताल ले जाने के प्रति जागरूक हुए लोग

कौड़ीराम निवासी सुनील और महिमा के आठ वर्षीय बेटे अनय की 23 अगस्त को तबीयत खराब हो गई। बच्चे को बुखार के साथ झटके भी आने लगे। यह एईस के लक्षणों में आता है। दम्पत्ति ने पहले स्थानीय निजी अस्पताल से इलाज करवाया और जब तबीयत में सुधार नहीं हुआ तो बिना देर किये 24 अगस्त को जिला अस्पताल में भर्ती करवा दिया। बच्चे की जांच की गई तो उसे डेंगू और इंसेफेलाइटिस दोनों की दिक्कत थी। अनय का इलाज हुआ और एक सितंबर को वह स्वस्थ होकर घर लौट गया। अनय की मां महिमा ने बताया कि वह लोग उम्मीद हार चुके थे लेकिन अस्पताल में समय से पहुंच जाने के कारण बच्चा स्वस्थ हो गया।

बदल रहा है लोगों का व्यवहार

वेक्टर बार्न कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉ. एके चौधरी का कहना है लोगों के व्यवहार में आए बदलाव से डेंगू, मलेरिया, इंसेफेलाइटिस, चिकनगुनिया जैसी हर बीमारी के नियंत्रण में मदद मिलेगी। दस्तक अभियान के जरिये लोगों के बीच पहुंचे संदेश ‘‘बुखार में देरी पड़ेगी भारी’’ ने तो असर डाला ही है, साथ में कोविड ने लोगों को स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा सतर्क किया है।

पांच प्रकार की जांच होती है

मुख्य चिकित्साधिकारी ने बताया कि जब बुखार के किसी रोगी में मानसिक अवचेतना की स्थिति परिलक्षित होती है तो उसे एईएस मान कर भर्ती किया जाता है। ऐसे मरीज की इंसेफेलाइटिस, स्क्रब्टाइफस, डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया की जांच कराई जाती है। लाक्षणिक उपचार की पद्धति से मरीज का इलाज किया जाता है।

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